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History Optional - Sihanta IAS

सर्वोत्तम परिणाम, सिहन्ता की पहचान

History Optional

इतिहास कैसे पढ़ें?

मुख्य बिंदु

1- पाठ्य पुस्तक:

प्रत्येक खंड के लिए एक-एक आधारभूत पुस्तक अवश्य पढ़ें।

आधारभूत पुस्तकों के बाद संस्थान से मिलने वाली पाठ्य सामग्री पर्याप्त सिद्ध होगी।

विविध खंडों के अध्ययन से सम्बन्धित शब्दकोश पढ़ें, जो संस्थान के द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।

सभी खंडों से पूछे गए एवं सम्भावी प्रश्नों के मॉडल उत्तर का अध्ययन करें, जो संस्थान के द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।

2- पाठ्यक्रम छोटा कैसे बने:

पूरे पाठ्यक्रम के सामान्य परिचय से एक कहानी दिमाग में बन जाएगी।

किसी भी अध्याय को अंतःविषयक दृष्टिकोण के साथ पढ़ने से वह अध्याय स्पष्ट एवं संक्षिप्त हो जाता है।

विभिन्न अध्यायों का अध्ययन निरन्तरता के साथ परिवर्तन के माध्यम से करें तो पता चलेगा कि प्रायः 70% से ज्यादा बातें पिछले अध्याय की ही जारी रहती हैं। इसको दृष्टिगत रखने से पिछले टॉपिक का पुनरावलोकन हो जाता है एवं आगे का टॉपिक भी छोटा हो जाता है।

इतिहास में व्यवस्था, जैसे अर्थव्यवस्था, व्यापार, उद्योग, समाज, महिलाओं की दशा, प्रशासन, कर-व्यवस्था, संस्कृति, धर्म, कला, साहित्य, आदि का अध्ययन होता है। यदि आपको इनकी व्यवस्था समझ में आ जाए तो यह पाठ्यक्रम संक्षिप्त, रोचक एवं अंकदायी हो जाता है।

3- साम्राज्यवादी, राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, सबाल्टर्न जैसी विचारधाराओं के प्रति स्पष्ट रहें, ताकि इतिहास-लेखन को समझ सकें। मार्क वैन ने बहुत हद तक ठीक ही कहा है कि ‘वह विशेष स्याही जिससे इतिहास लिखा जाता है, मात्र तरल पूर्वाग्रह है।’ अतः यदि आपने विभिन्न मतों का अध्ययन एवं मनन कर इन पर अपना मत नहीं बनाया है तो आप कोई तर्कसंगत राय नहीं बना पाएंगे।

4- प्रश्नों का उत्तर लिख कर याद करने का लाभ प्रायः राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में ही ज्यादा होता है। यूपीएससी के प्रश्न पत्र का उत्तर देने हेतु अलग रणनीति अपनाने की जरूरत होती है।

उत्तर लिखने की बजाय उत्तर का प्रारूप मात्र तैयार करें, ताकि संकल्पनाओं को निचोड़कर ठोस बिन्दु निकालने की योग्यता विकसित हो सके।

बिन्दुओं का वरियता क्रम निर्धारित करने का अभ्यास करें।

विभिन्न बिन्दुओं को क्रमवार व्यवस्थित करने का कौशल विकसित करना आवश्यक है।

5- विभिन्न विषयों पर अपना तर्कसंगत निर्णय निकालने का अभ्यास करें।

6- मानचित्र के प्रश्न पर आरम्भ से ही ध्यान दें।

7- निरंतरता के साथ परिवर्तन का ध्यान रखना इतिहास के अध्ययन का अनिवार्य पक्ष है जो आपके अध्ययन के विभिन्न अध्यायों को एक-दूसरे से जोड़कर आपके पाठ्यक्रम को छोटा, रोचक और अंकदायी बना देता है।

8- तुलनात्मक अध्ययन से विषय पर आपकी बेहतर समझ बनती है और इसके बदौलत आपके अंक में भी वृद्धि हो जाती है।

इस तरह के सुझाव तो कई और दिए जा सकते हैं, लेकिन कई सुझावों का एक सार है कि अध्ययन के लिए शिक्षक की जरूरत तो राम और कृष्ण को भी हुई थी, इसलिए आप भी अपने लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक चुनें।

हम उपरोक्त बिंदुओं को निम्न चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं-

इतिहास के संदर्भ में भ्रांतियाँ

प्रश्न: क्या इतिहास का पाठ्यक्रम बहुत बड़ा है?  

उत्तर: प्रथम दृष्टया इसका पाठ्यक्रम बड़ा लगता है, लेकिन इसके ऊपर युक्ति संगत विचार करने के बाद आप निम्न बातों से गुजरेंगे- 

(क) इसका पाठ्यक्रम क्षैतिज रूप से बड़ा है लेकिन दर्शनशास्त्र, लोक प्रशासन, साहित्य या समाजशास्त्र जैसे  विषयों की तरह लम्बवत रूप से गहरा नहीं है। विभिन्न बिंदुओं पर संक्षिप्त जानकारी और तार्किक समझ आपकी परीक्षा के लिए पर्याप्त सिद्ध होती है। 

(ख) यह सामान्य अध्ययन के प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा की तैयारी में लगने वाले अतिरिक्त समय की बचत करता हैै। यदि सामान्य अध्ययन में इसकी भूमिका को समझा जाए तो इसका पाठ्यक्रम अंततः छोटा सिद्ध होता है, क्योंकि वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ने के लिए 6-7 महीने की जरूरत होती है जबकि सामान्य अध्ययन का इतिहास और संस्कृति वाले खंड के अध्ययन के लिए भी कम से कम 3 महीने की जरूरत होती है। 

(ग) प्रत्येक विषय में प्रथम चक्र की पढ़ाई के बाद कम से कम 3-4 चक्रों के पुनरवलोकन की जरूरत होती है। चूँकि इतिहास में नवीन तथ्यों का समाहार नहीं होता है, इसलिए इसका पुनरवलोकन सबसे सहज और संक्षिप्त होता हैं।  

(घ) इतिहास कैसे पढ़ना चाहिए, वाले पृष्ठ पर यह भी बताया गया है कि इस विषय को संक्षिप्त बनाने के कई तकनीकी उपाय है।  

प्रश्न: क्या इतिहास बहुत अधिक तथ्यात्मक विषय है?  

उत्तर: तथ्य इतिहास का प्राथमिक आधार है, लेकिन यू-पी-एस-सी- की परीक्षा आपकी प्रशासकीय योग्यता की जाँच पर आधारित है और इतिहास अन्य विषयों की ही तरह एक वैकल्पिक विषय है। इसलिए इसमें शोध कार्य के समान ज्यादा तथ्यों की जरूरत नहीं पड़ती है। आपकी परीक्षा में सामान्य तथ्यों की जानकारी पर्याप्त मानी जाती है और आयोग का ध्यान इस बात पर केंद्रित होता है कि आप की समझ गहन है या नहीं। इतिहास एवं संस्कृति से संबंधित प्रारंभिक परीक्षा में जितने तथ्यों की जानकारी आवश्यक है, लगभग उतना ही तथ्य मुख्य परीक्षा के लिए पर्याप्त है। इस विषय पर थ्यूसीडाईडिज के निम्न कथन से आपकी समझ स्पष्ट हो सकती है- ‘‘इतिहास उदाहरणों के माध्यम से पढ़ाया जाने वाला एक दर्शन है।’’ यह अध्ययन की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें बेजुबान तथ्यों में छुपी हुई समाज, राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति आदि को उद्घाटित करने के लिए उसके प्रवक्ता यानि इतिहासकार को इनसे संबंधित व्यवस्था और विचारधारा का इस्तेमाल करना होता है। इसके लिए अंतःविषयक दृष्टिकोण और तर्कशक्ति सम्पन्नता की विशेष जरूरत होती है। 

प्रश्न: क्या इतिहास में अच्छा अंक प्राप्त किया जा सकता है?  

उत्तर: हिन्दी माध्यम के विगत वर्षाें के परिणामों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि प्रथम दस उच्च स्थानों में तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ एवं नौवाँ स्थान ही अभी तक का सर्वाेत्तम परिणाम रहा है और इन सभी विद्यार्थियों का एक वैकल्पिक विषय इतिहास रहा है। इतिहास में अंक प्राप्ति में स्थिरता एवं निरन्तरता है, जो इसे अन्य विषयों पर वरीयता प्रदान करता है। इसके अंकदायी होने का प्रमाण आप निम्न उदाहरणों से समझ सकते हैं-

  1-  विष्णुकांत तिवारी को इतिहास में 378/600 अंक आया, फिर भी अंतिम चयन नहीं हुआ, क्योंकि सामान्य अध्ययन में भूमिका रखने वाले एक दूसरे विषय में काफी कम अंक आ गया। 

  2-  राजेन्द्र मीणा को इतिहास में 371/600 अंक आया, लेकिन सामान्य अध्ययन में भूमिका वाले दूसरे विषय में कम अंक के कारण काफी पीछे का रैंक आया। 

  3-  मयंक प्रभा तोमर को भी इतिहास में 371/600 अंक आया, लेकिन अन्य विषयों में कम या अति साधारण अंक आने के कारण पीछे का रैंक मिला। 

  4-  किरण कौशल को इतिहास में सर्वाधिक अंक के साथ अन्य विषयों में भी ठीक-ठाक अंक आ गए तो वह तीसरा रैंक ले आई, जो हिन्दी माध्यम का आज तक का सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन है।  

  5-  जबसे वैकल्पिक विषय में 500 का पूर्णांक हुआ है, तब से इतिहास के विद्यार्थियों का अंक उत्साहवर्धक रहा। आकांक्षा शर्मा का 307/500 और गौरव कुमार का 310/500 अंक इसका प्रमाण है। 2018 की मुख्य परीक्षा में सिर्फ सिहन्ता के 6 विद्यार्थियों को 300 से ज्यादा अंक मिला है। बीपीएससी की 63वीं परीक्षा के टॉपर (रैंक-1) श्रेयांश तिवारी को इतिहास में 223/300 अंक मिला। स्मरणीय है कि- 

 (क) उपरोक्त सभी आँकड़े सिहन्ता के विद्यार्थियों के हैं।  

 (ख) इन दिनों 54-55% अंक लाने वाले, संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में प्रथम रैंक लाने में कामयाब हो जाते हैं। यानि अन्य विषयों में इतिहास के समान अंक आया होता तो अभी तक दर्जनों ऐसे विद्यार्थी होते जो हिन्दी माध्यम से प्रथम रैंक प्राप्त कर चुके होते।

इतिहास अध्ययन की एक विधा है, जिसमें हम विभिन्न स्रोतों के हवाले से उपलब्ध तथ्यों के सहयोग से किसी भी देश और काल की दशा और दिशा का अध्ययन करते हैं। इसके तहत किसी भी विद्यार्थी को समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राज्य एवं शासन का अध्ययन करना होता है। उपरोक्त पक्षों की विषय-वस्तु की समझ किसी भी विद्यार्थी के लिए अनिवार्य होती है। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि कोई भी इतिहासकार जब लिखता है तो इस क्रम में उसका पूर्वाग्रह भी शामिल हो जाता है। अतः विद्यार्थियों को इसका तार्किक परीक्षण भी करना चाहिए। आपसे अपेक्षित है कि आप विभिन्न विषयों पर अपनी तार्किक समझ बनाएँ। इतिहासकार बेजुबान तथ्यों काफ़ प्रवक्ता होता है। अतः आपको तटस्थ रहते हुए अपनी कल्पनाशक्ति और अपने तर्क का उपयोग करते हुए अपना निष्कर्ष निकालना चाहिए। 

मुख्य परीक्षा में प्रवृत्तिगत परिवर्तन को दृष्टिगत रखते हुए कुछ सुझाव-

आगे जिन बुनियादी सुझावों का ब्यौरा दिया गया है, वे न तो जैन धर्म के 14 पूर्व हैं और न ही कोई 14 सूत्री फॉर्मूला, लेकिन संघ लोक सेवा आयोग में पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्नों एवं नवीन पाठ्यक्रम के आधार पर तैयारी की दिशा में रणनीतिक अनुकूलता के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। जैसे-

1- विद्यार्थी प्रायः किसी अध्याय विशेष का अध्ययन करने के वक्त उसके उप-अध्यायों पर यथोचित दृष्टि नहीं रखते हैं, जबकि उन पर प्रश्न पूछा जा सकता है_ जैसे कि मौर्य साहित्य, सातवाहन, शक, खारवेल आदि। 2009 से मुख्य परीक्षा में जिस प्रकार से दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों को दो टुकड़ों में तोड़ा गया, उसके मद्देनजर इस तरह के खण्डों की तैयारी की आवश्यकता बढ़ गई। 

2- प्राचीन भारत के खण्ड से मानचित्र आधारित प्रश्न पिछले कई वर्षों से आता रहा है, जिस कारण छात्रें को उससे एक ही अतिरिक्त प्रश्न तैयार करने का अवसर मिल जाता रहा था। लेकिन अब यह रणनीति घातक सिद्ध हो सकती है, क्योंकि एक प्रश्न के अन्दर तीन प्रश्नों को किन्हीं भी दो-तीन अध्यायों से उठाया जा सकता है। फिर यह भी स्मरणीय है कि नवीन पाठ्यक्रम में कई ऐसे विषयों को शामिल किया गया है जिस पर 60 अंकों का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न सम्भावित नहीं लगता है। ऐसे में इन उप-अध्यायों की प्रासंगिकता 15 या 20 अंकों वाले प्रश्नों के लिए बढ़ जाती है। पहले और पाँचवें प्रश्नों में 10 अंकों का प्रश्न भी पूछा जाता है और इसमें विकल्प नहीं होता है। इसलिए अब पहले से ज्यादा कवरेज की जरूरत है।

3- प्राचीन भारत में स्रोत-आधारित प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति बढ़ी है, अतः पहले अध्याय पर विशेष तौर पर बल देने की जरूरत तो है ही, अन्य अध्यायों के अध्ययन के वक्त भी उसी अध्याय से सम्बन्धित स्रोतों का एक व्यवस्थित ब्यौरा तैयार कर लेना अपेक्षित है। 

4- प्रथम पत्र में सामाजिक और आर्थिक पक्षों से प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जैसेµ मौर्यकाल से गुप्तकाल तक महिलाओं की दशा, गुप्तकालीन आम जनजीवन की दशा, मुगलकालीन नगरीकरण, 15-16वीं शताब्दी में कृषि और शिल्प के विकास का समाज पर पड़ने वाला प्रभाव, दिल्ली सल्तनत में नगरों का विकास आदि। वस्तुतः पिछले दशकों में पाठ्यक्रम के इस खण्ड के इन्हीं पक्षों के शोध कार्यों में गति आई है, जो प्रश्नपत्र के स्वरूप को भी प्रभावित कर रहा है। 

5- प्रथम पत्र में सांस्कृतिक पक्ष से प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है, जिसके कई कारण हैंµ 

(ं) प्राचीन भारत से सम्बन्धित पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अध्ययन का सबसे ज्यादा लाभ सांस्कृतिक इतिहास लेखन को हुआ। 

(इ) क्षेत्रीय इतिहास लेखन को मुख्य धारा से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो सांस्कृतिक माध्यमों से जुड़ती है और इसी कारण तमिल भक्ति आन्दोलन जैसे प्रश्नों की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। इसके साथ ही क्षेत्रीय विशिष्टता की अभिव्यक्ति के लिए भी कला और स्थापत्य की भूमिका महत्वपूर्ण है, जो मन्दिर आधारित प्रश्न पूछे जाने की संभावना बढ़ा देती है। लालदेव पर पूछा गया प्रश्न या कश्मीर का स्थापत्य अथवा कैलाश मंदिर का प्रश्न इसी का उदाहरण है। 

(ब) सल्तनत और मुगलकाल में सामासिक संस्कृति के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाता रहा है, इसलिए इस खण्ड से भक्ति-सूफी, स्थापत्य कला, चित्रकला आदि क्षेत्रें से प्रश्न पूछने की सम्भावना उभरती है। इसी के मद्देनजर दिल्ली सल्तनत के स्थापत्य और मुगल संगीत या मुगलकालीन मिश्रित अमीर वर्ग आदि से भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

6- इतिहास लेखन के दो प्रमुख आधार हैंµ 

(ं) प्राथमिक स्रोत 

(इ) द्वितीयक स्रोत। 

प्राथमिक स्रोतों की चर्चा तो हम ऊपर कर चुके हैं, लेकिन स्मरणीय है कि पिछले दिनों द्वितीयक स्रोतों पर आधारित प्रश्नों की प्रवृत्ति भी बढ़ी है_ जैसेµ मौर्योत्तरकालीन अंधकार-युग की संकल्पना या 18वीं सदी सम्बन्धी इतिहासकारों के विमर्श पर 2008 में दो प्रश्न आ गए थे। ध्यातव्य है कि इतिहास-लेखन के आधार पर इतिहास की समझ की उपयोगिता यद्यपि प्रथम प्रश्नपत्र में भी काफी है, लेकिन द्वितीय प्रश्नपत्र में इसकी भूमिका और भी ज्यादा बढ़ गई है। द्वितीय प्रश्नपत्र में पूछे गए प्रश्नों का चरित्र प्रायः इस बात से प्रभावित होता है कि किसी भी विषय पर लिखने वाले प्रमुख इतिहासकारों की राय क्या है? जैसे अमेरिका की क्रान्ति के कारणों पर लिखने वाले इतिहासकारों को हम मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं। एक श्रेणी के लोगों की मान्यता यह है कि 1750 ई- तक आते-आते अमेरिका की क्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी, जबकि दूसरी श्रेणी के लोग 1763 ई- के बाद के घटनाक्रमों को अमेरिका की क्रान्ति के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। इसी के मद्देनजर दो प्रश्नों को देखा जा सकता है- (i) वयस्क होते औपनिवेशिक समाज में अमेरिकी क्रान्ति एक अपेक्षित घटना थी। (ii) इंग्लैण्ड को अमेरिका से हाथ धोना पड़ा, क्योंकि ग्रेनविले अमेरिका से आने वाली डाक पढ़ने लगा था। इन दोनों प्रश्नों के पीछे दो विचारधाराओं को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसी तरह से 2009 में भी द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की भूमिका को लेकर टेलर के मत पर आधारित एक प्रश्न आया। स्मरणीय है कि इस प्रश्न में भले ही टेलर का नाम दे दिया गया हो, लेकिन अधिकांश प्रश्नों में इतिहासकार का नाम रहे या न रहे, विद्यार्थियों को सम्बन्धित विचारधारा की समझ के आधार पर परखने की कोशिश की जाती है।

7- इतिहास के ज्यादातर प्रश्न तीन आधारों पर बनाए जा रहे हैं- (a) घटना, (b) व्यक्ति, (c) व्यवस्था। घटना के अन्दर चलकर देखें तो उसके कारण, स्वरूप और प्रभाव पर सवाल बनते हैं। व्यक्ति आधारित प्रश्नों में ज्यादातर उसके आदर्श, कार्य या उसके प्रभाव पक्ष से प्रश्न बनता है। अवस्था या व्यवस्था आधारित प्रश्न ज्यादातर प्रथम प्रश्नपत्र में पूछे जाते हैं, जैसे महिलाओं की अवस्था, आम जन की अवस्था, प्रशासन की व्यवस्था, अर्थव्यवस्था आदि। चूँकि 2009 से दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों को टुकड़ों में तोड़ा गया है, अतः इस बात की सम्भावना बनती है कि इनके किसी एक खण्ड-विशेष पर प्रश्न बनाया जाए, जैसे अर्थव्यवस्था के अंदर से शिल्प या इसके अन्दर भी चलकर देखें तो किसी कालखण्ड के किसी विशेष शिल्प या व्यापार अथवा इसके अन्दर से भी विदेश व्यापार अथवा मौद्रिक अर्थव्यवस्था या फिर इसके अन्दर से भी स्वर्ण सिक्का अथवा अन्य धातुओं के सिक्कों आदि के आधार पर प्रश्न पूछा जा सकता है। 

8-  द्वितीय प्रश्नपत्र में तकनीकी शब्दों के आधार पर प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति आमतौर पर देखी जा सकती हैं। जैसेµ पूँजीवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, तर्कबुद्धिवाद, उदारवाद आदि। इस प्रश्नपत्र में प्रायः इन शब्दों के इर्द-गिर्द ही कई लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनका समाधान तभी हो सकता है जब इतिहास के वैचारिक पक्ष का अध्ययन यथोचित स्तर पर किया जाए।

9-  विश्व इतिहास में पाठ्यक्रम में शामिल किए गए नए अध्यायों पर यू-पी-एस-सी- की विशेष दृष्टि देखी जा सकती है। अतः इनके अध्ययन पर विशेष बल दिए जाने की जरूरत है। आधुनिक भारत में 1947 ई- के बाद के पक्ष पर भी ध्यान देना होगा, जिनसे प्रायः एक और कभी-कभी दो प्रश्न आ जाते हैं।

10- द्वितीय प्रश्नपत्र में दो अध्यायों के बीच से भी प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। तात्पर्य यह है कि प्रथम प्रश्नपत्र में ज्यादातर प्रश्न पाठ्यक्रम में लिखित उप-अध्यायों पर प्रत्यक्ष प्रश्न पूछे जा रहे हैं, जबकि द्वितीय प्रश्नपत्र में ऐसा नहीं है, जैसे कि यूरोप के विकास और उसके पतन में पूँजीवाद की भूमिका पर पूछा गया प्रश्न या फिर काँग्रेस के सामाजिक आधार पर पूछा गया प्रश्न आदि। इसके लिए विषय की सामान्य समझ का गहरा होना आवश्यक है।

11- मानचित्र आधारित प्रश्नों पर भी विशेष दृष्टि रखने की जरूरत होती है। स्मरणीय है कि अब मानचित्र के प्रश्न में नवीन प्रणाली के तहत स्थानों की पहचान करना आवश्यक हो गया है, इसलिए मानचित्र का नियमित निरीक्षण, अभ्यास एवं स्थल परिचय पर विशेष बल देने की जरूरत है। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे विवरण के पक्ष पर विशेष ध्यान दें। लगभग 600 स्थलों का विवरण यदि तैयार किया जाए तो यह कार्य आसान हो जाएगा। ध्यातव्य है कि इन स्थलों की तैयारी को मुख्य परीक्षा के अन्य प्रश्नों के उत्तर में भी उपयोग में लाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि नवपाषाण-कालीन जीवन-दशा पर प्रश्न पूछा जाए तो मेहरगढ़, बुर्जहोम, गुफ्रफकराल, कोल्डिहवा, चिरांद, पिक्कीहल, उत्तनूर, महिषदल आदि स्थलों के बारे में यथोचित जानकारी के बिना उत्तर लिखा ही नहीं जा सकता। इसी तरह से अशोक के अभिलेखों की भौगोलिक स्थिति की जानकारी के आधार पर मानचित्र के प्रश्न की तैयारी तो हो ही जाती है, मौर्य साम्राज्य की सीमा निर्धारण के प्रश्न का उत्तर भी आसानी से लिखा जा सकता है। ऐसे दर्जनों प्रश्नों का उत्तर इसके माध्यम से निकल सकता है।

12- प्रश्नों को टुकड़ों में तोड़े जाने के कारण प्रश्नपत्र लम्बा हो गया है, अतः छात्रें को कम शब्दों में संरचनात्मक तरीके से अपनी बात कहने का अभ्यास निश्चित तौर पर करना चाहिए। 150 शब्दों के प्रश्नों का उत्तर 6 मिनट में, 225 शब्दों के प्रश्नों का उत्तर 9 मिनट में और 300 शब्दों के प्रश्नों का उत्तर 12 मिनट में लिखने का अभ्यास करना चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक प्रश्न को पढ़ने, उसे समझने और उसका उत्तर मन में गढ़ने के लिए 90 सेकेण्ड्स का समय लगाना आवश्यक है। इसी तरह से हम 180 मिनट में 19 प्रश्नों के सारगर्भित उत्तर लिख सकते हैं। 

13- कई बार एक प्रश्न में ही अनेक प्रश्नों को जोड़ दिया जाता है और कभी-कभी किसी एक सूक्ष्म बिन्दु पर ही पूरा प्रश्न पूछ लिया जाता है, जैसे पहली श्रेणी के तहत हड़प्पा सभ्यता की विशेषता एवं पतन और निरन्तरता पर आधारित एक ही प्रश्न या 2000 ई-पू- से 500 ई-पू- तक की जीवन-दशा पर आधारित प्रश्न अथवा पूरे मुगलकालीन राजपूत नीति और उसके प्रभाव पर पूछे गए प्रश्न को देखा जा सकता है। दूसरी श्रेणी के तहत मुगलकालीन साहित्य को देखा जा सकता है। पहली श्रेणी के प्रश्नों का उत्तर लिखने के लिए प्राथमिक बिन्दुओं के अन्दर वरीयता का निर्धारण जरूरी है, जबकि दूसरी श्रेणी के प्रश्नों का उत्तर लिखने के लिए समुचित सामग्री एवं सम्बन्धित विषय की विविध परतों को उद्घाटित करने की जरूरत है। यानि सिन्धु को बिन्दु और बिन्दु को सिन्धु बनाने के अभ्यास की जरूरत है।

14- विषय का परिचयात्मक ज्ञान ही लेना है और इसके बाद उसकी समझ विकसित करने और उसका उपयोग करते हुए उत्तर-लेखन के अभ्यास के लिए अपना ध्यान केंद्रित करना है। थोड़े को ही ज्यादा पढ़ें।  

वस्तुतः संघ लोक सेवा आयोग लगातार पुराने पैटर्न को तोड़ने की कोशिश कर रहा है अतः आप भी निरन्तर रणनीतिक कौशल का परिचय दें।

© Sihanta IAS
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