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सर्वोत्तम परिणाम, सिहन्ता की पहचान

राष्ट्रीय राजनीति और सांस्कृतिक आधार एवं वामपंथ


वामपंथ संस्कृति की दूसरी परम्परा चाहता है और वैचारिक आग्रह के दबाव में वह हज़ारों साल की परम्परा की छाती पर आँख मूँदकर चढ़ जाता है। इस क्रम में वह प्रायः नीर छीर विवेक का परिचय नहीं देता।

कॉंग्रेस का 1920 तक का नरमपंथी चरण पश्चिम के रंग में रंगा राष्ट्रवाद था। इसलिए वह लोकप्रिय राजनीति से अलग ही रहा। गरमपंथी राष्ट्रवाद भारतीय जीवन पद्धति का विकल्प लेकर आया था और इसका प्रतिरोध भाव भी प्रबल था। इसके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक अन्तर्निहित प्रवृत्ति यह थी  कि IPC section 124 (A) से बचने के लिए इसने ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवाद की प्रक्षन्न अभिव्यक्ति मुस्लिम हमलावरों के विरुद्ध हिन्दू क्षेत्रीय नायकों को राष्ट्रीय नायक बताने के रूप में किया। बालगंगाधर तिलक इस दौर के राष्ट्रवाद की सबसे सशक्त और निर्भीक अभिव्यक्ति थे।

1920 के बाद राष्ट्र का नेतृत्व गांधी के हाथ आ गया। एक इतिहासकार ने ठीक ही लिखा है कि “यज्ञ का धनुष परशुराम के हाथ से निकलकर राम के हाथ आ गया।” गांधी का राष्ट्रवाद साम्राज्य विरोधी राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। इनका स्वराज का विचार राजनीतिक आज़ादी से लेकर लोकतंत्र और आध्यात्मिक मुक्ति के वैदिक विचार तक को समाहित किये हुए था। गांधी भारतीय शासन मात्र नहीं बल्कि भारतीय जीवन पद्धति का आदर्श लेकर चल रहे थे।

इनके समानांतर भारत मे 4 और धाराएँ चल रही थी-

  1. हिन्दू-मुस्लिम प्रबलता की घारा। इसकी तुलनात्मक सांस्कृतिक श्रेष्ठता की अंतर्निहित प्रवृत्ति अंतहीन आंतरिक कलह की सम्भावना से सम्पन्न थी।
  2. जाति आधारित राजनीति जो समता और सामाजिक न्याय के आदर्श के साथ विकसित हुई । इस धारा की प्रबलतम अभिव्यक्ति डॉक्टर अम्बेडकर के माध्यम से हुई । परम्परा की विभेदकारी दृष्टि और व्यवस्था पर उनका आक्षेप युक्तिसंगत और न्यायसंगत था। लेकिन उनकी सीमा यह थी उनका विकल्प पश्चिमी था जिसका भारतीय प्रकृति और संस्कृति से रचनात्मक तालमेल नहीं हो सका।  गॉंव को अम्बेडकर जाति की सामाजिक व्यवस्था का गढ़ मानते थे । इसलिए वो ग्राम स्वराज के विचार के विरुद्ध थे । यह उनकी राजनीतिक दृष्टि की सबसे बड़ी सीमा थी।
  3. लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद और समाजवादी सेकुलर जीवन पद्धति का विचार । इस विचार की अभिव्यक्ति सबसे ज़्यादा नेहरू के माध्यम से हुई। उनका विचार पूर्व और पश्चिम का ऐसा सन्धि स्थल था जिसमें पश्चिमी राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था का पूर्वी अहिंसक, सहअस्तित्ववादी, जीव मात्र का कल्याण और आध्यात्मिक जीवन का संयोग था। नेहरू ने  अपने अध्ययन के तहत एक तरफ़ जहां विश्व की झांकी देखा था वहीं भारत की खोज भी किया था।
  4. कम्युनिस्ट तर्क का भँवरजाल तो बुनते हैं लेकिन मार्क्स के ऐतिहासिक द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का त्याग तो स्वयं मार्क्स ने पेरिस कम्यून के समय कर दिया था। लेनिन ने रूस में ‘कम्युनिस्ट क्रांति’ का विचार प्रशस्त करते हुए द्वंद्वात्मकता के विचार का त्याग कर दिया था। इस वैचारिक स्वेच्छाचार में ही लेनिनवाद की अलोकतांत्रिकता अन्तर्निहित थी। सत्ता में आने के बाद उसने उस ड्यूमा(संसद) को भंग कर दिया जिसमें एक दूसरे दल को स्पष्ट बहुमत मिला था। उसने बलपूर्वक जिस सत्ता की स्थापना किया था  उसे क्रांति का नाम देना और जनमत की छाती तोड़ कर उसकी रक्षा  करने को क्रांतिकारी संरक्षण कहना इतिहासवेत्ताओं की मनमर्ज़ी का प्रमाण है। यही धारा वैश्विक स्तर पर अपना प्रसार करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की ओर मुड़ी । 1925 में भारत में अस्तित्व में आने वाली कम्युनिस्ट पार्टी भी इसी कोमिन्टर्न का एक हिस्सा थी। इसने कभी कॉंग्रेस के साथ संयोजन स्थापित किया तो कभी उसे पूँजीवादी करार देकर उसे और ब्रिटिश शासन दोनों को विरोध के लायक़ क़रार दिया । विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि उपरोक्त में से कोई भी निर्णय भारत के कम्युनिस्ट दल ने नहीं लिया था। स्वाभाविक है कि इनकी  दृष्टि कभी भी भारतीय नहीं थी। यानि कि इनके विचार का विकास भारतीय प्रकृति और संस्कृति की जड़ों से दूर के परिवेश में हुआ था । यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय वामपंथ भी सामान्यतः भारत के अतीत का अध्ययन जानने या सीखने के भाव से नहीं बल्कि आलोचनात्मक भाव से ही किया। इनका अध्ययन कुछ सूत्रों के रास्ते हुआ जो प्रायः मूर्तिभंजक भाव के साथ विकसित हुआ। भारतीय संस्कृति के प्रति कम्युनिस्ट पार्टी का यह भाव तब भी जारी रहा जबकि उनकी राजनीति का भारतीयकरण हो गया। इसीलिए कम्युनिस्ट दल से लेकर विचारक और समर्थक एवं सहानुभूति रखने वाले अधिकांश लोगों के बौद्धिक विमर्श का शब्दकोश भी पश्चिमी ही है। वो ग़रीबी की भाषा तो बोलते हैं पर ग़रीबों की भाषा नहीं बोलते।

आज़ाद भारत नेहरू के काल मे प्रबुद्ध और औद्योगिक यूरोप  और आध्यात्मिक  एवं सांस्कृतिक भारत के संयोजन के रास्ते चला जिस पर वामपंथ के रेशमी स्पर्श का निर्णायक प्रभाव था। लेकिन इंदिरा गांधी के काल के दौरान कॉंग्रेस पार्टी राजनीति तक सीमित रह गई । इस दौरान कॉंग्रेस ने बौद्धिक और सांस्कृतिक स्तर पर बहुआयामी दिशा परिवर्तन का मार्ग पकड़ लिया जिसमें वर्धित वामपंथीकरण और तुष्टिकरण उल्लेखनीय है। इंदिरा के इस विकल्प का विकास नेहरू के वैचारिक विरासत में राजनीतिक आकांक्षा के घालमेल से हुआ था।  यहाँ से भारतीय राजनीति अपनी संस्कृति के जड़ से विमुख होने लगी । हलॉंकि इस दिशा में पहला बड़ा विचलन गांधी की हत्या के साथ आया था। गोडसे ने गांधी को  गोली मार दिया तो भारतीय संविधान सभा ने गांधी को गोली दे दिया । युग का महानतम मनीषी संविधान में उपदेशक मात्र बनकर रह गया।

इंदिरा जी के बाद का विमर्श फिर कभी!!

2,827 responses on "राष्ट्रीय राजनीति और सांस्कृतिक ...."

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